रीवा नगर पालिक निगम की आर्थिक कार्यप्रणाली का अध्ययन
दुती शुक्ला
शोधार्थी (वाणिज्य), शा. ठा.र. सिंह महाविद्यालय रीवा (म.प्र.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
नगर के सर्वांगीण विकास में नगर पालिक निगम की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्थानीय समस्याओं का समाधान वास्तव में इन्ही संस्थाओं के माध्यम से संभव है। प्राथमिक शिक्षा, बिमारियो की रोकथाम, विद्युत व्यवस्था, जल आपूर्ति, वार्ड तथा स्थानीय सड़कों का रख रखाव आदि ऐसे कार्य है जिन्हे केन्द्र या राज्यसरकार आसानी से पूरा नही कर सकते, ऐसे कार्याें को केवल स्थानीय स्तर पर ही पूरा किया जा सकता है। नगर निगम के द्वारा निगम क्षेत्र के अन्दर स्थित सार्वजनिक स्थलो जैसे मंदिर, मस्जिद, गुरूदारा, उद्यान, पुरातात्विक भवन, चैराहो, मूर्तियों, बस स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशन आदि को सुरक्षित रखने एवं उनकी देखरेख करने के लिए नगर निगम के द्वारा नीति का निर्धारण किया जाता है ताकि इन स्थानों को सुरक्षित एवं उपयोगी बनाए रखा जा सके।
KEYWORDS: संघीय शासन प्रणाली, नगर निगम, नगरीय विकास, आर्थिक विकास।
INTRODUCTION:
स्ंाघीय शासन प्रणाली में शासन को तीन प्रमुख भागों में बाटा गया है जिसके प्रथम भाग में केन्द्रिय सरकार दूसरे भाग में राज्य शासन और तीसरे भाग में स्थानीय स्वायत्व संस्थान (नगर निगम, नगर निगम, नगर पंचायत, जिला पंचायत, जनपद पंचायत, ग्राम पंचायत) को शामिल किया गया है।
वर्तमान समय में स्थानीय संस्थाओं का महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। स्थानीय संस्थाओं में सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती है और उसी के अनुरूप नगरीय आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास किया जाता है।
स्थानीय संस्थाओं के महत्व को प्रतिपादित करते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि - ‘‘स्थानीय शासन भी अच्छी लोकतंत्र व्यवस्था के सुदृण आधार होते है।’’2
‘‘रीवा में सर्वप्रथम नगर निगम की शुरूआत सन् 1920 में हुई थी। जिसके कारण सन् 1922 में रीवा राज्य सेनीटेशन लाॅ बना।’’ उस समय रीवा नगर की सफाई व्यवस्था का संचालन स्वास्थ्य विभाग द्वारा किया जाता था। जिसमें एक सफाई दरोगा और 6 सफाई कर्मी थे। रीवा नगर की बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए 11 अक्टूबर 1946 में रीवा स्टेट म्यूनिसीपल एक्ट लागू किया गया जिसमें संस्था को कुछ अतिरिक्त जिम्मेदारियाॅ सौपी गयी। 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता के बाद रीवा राज्य को विन्ध्य प्रदेश की राजधानी बनाया गया। जिसके चलते रीवा स्टेट म्यूनिसीपल एक्ट 1946 को विन्ध्य प्रदेश म्यूनिसीपल एक्ट में परिवर्तित किया गया जिसके प्रमुख महाराजा मार्तण्ड सिंह बने जब प्रथम आम चुनाव की घोषणा हुई तो विन्ध्य प्रदेश का भी अपना मंत्री मण्डल बना। जिसके चलते नगर निगम को सफाई व्यवस्था के साथ-साथ बिजली और पार्को के रख-रखाव की जबावदारी सौपी गयी थी। उस समय नगर निगम के प्रथम अध्यक्ष लाल यादवेन्द्र सिंह को मनोनित करके बनाया गया। नगर निगम के चुनाव पश्चात रण बहादुर सिंह, मुनिप्रसाद शुक्ला, मक्सुदन प्रसाद तिवारी, हफीजुद्दीन सिद्दीकी, जर्नादन पाण्डेय, मास्टर महेन्द्र सिंह, शेख हबीब मंसूरी नगर निगम रीवा के अध्यक्ष रहें। उस समय धारा 15 के अनुसार निगम परिसर का कार्यकाल 3 वर्ष का होता था। सन् 1975 के नगर निगम चुनाव में श्री नागेन्द्र सिंह 5 वर्ष तक नगर निगम के अध्यक्ष पद पर आसीन रहें। 1 जनवरी 1981 को जब रीवा नगर निगम को रीवा नगर निगम का दर्जा दिया गया तो उसके बाद 15 वर्ष तक रीवा नगर निगम के चुनाव नहीं हुये।
सन् 1994 पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के बाद प्रथम महापौर के रूप में अमीरूल्ला पार्षदों द्वारा निर्वाचित हुये उसके बाद निर्वाचित श्री राजेन्द्र ताम्रकार, श्रीमती आशा सिंह, श्री वीरेन्द्र कुमार गुप्ता महापौर रहें हैं और वर्तमान में नगर पालिक निगम रीवा के शीवेन्द्र सिंह पटेल महापौर के पद पर आसीन हैं। जिनकी कार्यकाल में रीवा शहर में अनेक विकास कार्य को मूर्त रूप प्रदान किया गया है। रीवा नगर निगम में दायित्वों के निर्वहन के लिये वर्ममान समय में 521 नियमित कर्मचारी 26 कार्यभारित, 2 दैनिकभोगी कर्मचारी कार्यरत है। जिनके वेतन के रूप में नगर निगम के द्वारा लगभग 84 लाख रू0 का प्रतिमाह भुगतान किया जाता है।
‘‘रीवा नगर में स्वायत्य संस्थाओ की शुरूआत नगर पालिक निगम के रूप में 1920 में हुई तथा नगर निगम का गठन 1 जनवरी 1981 को किया गया।‘‘3 विभिन्न सार्वजानिक एवं जनउपयोगी कार्यक्रमों को करने के लिए नगर पालिक निगम को वित्त की आवश्यकता होती है क्योकी स्थानीय शासन की योजनाए तब तक सफल नही हो सकती जब तक कि वह वित्तीय रूप से सुदृण न हो। रीवा नगर निगम एक महत्वपूर्ण ईकाई है जो नित्य नये तीव्रगामी परिर्वतनो को शहरी क्षेत्र में प्रभावी करने में अहम भूमिका निभा रही है। रीवा नगर पालिक निगम द्वारा शहरी क्षेत्र में शासन की विभिन्न नितियों निर्णयों तथा क्रिया कलापों एवं योजनाओं को जो आम जन एवं क्षेत्र के विकास से संबंधित है उन्हे मुर्त रूप में लाने का प्रयास किया जाता है।
‘‘नगर निगम की नीतियों का निर्माण नगर पालिक निगम अधिनियम 1961 में वर्णित प्रावधानों एवं मार्गदर्शन के आधार पर किया जाता है।’’1 नगर निगम की नीति क्षेत्रवासियों को उनके अधिकार कर्तव्य एवं दायित्वोें का बोध कराने में सहायक होती है। इन नीतियों का उपयोग करके क्षेत्र में सम्पूर्ण क्रिया विधि का संचालन (चाहे वह सामाजिक हो आर्थिक हो अथवा प्रशासनिक) किया जाता है। नगर पालिक निगम अधिनियम 1961 में नगर निगम की स्थापना, विकास, कर्मचारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सुविधाए, नागरिकों के अधिकार, नागरिकों के दायित्व, से संबंधित बातों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है जिसके आधार पर रीवा नगर निगम में भी नगर निगम से संबंधित नीतियों एवं नियमोें का निर्माण किया गया है और क्षेत्र में स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को लागू करने का कार्य सामूहिक रूप से नगर निगम पदाधिकारियो एवं कर्मचारियों द्वारा किया जाता है।
रीवा नगर निगम की नीतियां क्षेत्र की पृष्ठ भूमि को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है ताकि अधिकतम सामाजिक लाभ के साथ-साथ क्षेत्र का विकास भी तीव्र गति से नियमानुसार किया जा सके।
शोध उद्देश्यः
नगर निगम के महापौर की स्वीकृति प्राप्त करके विभिन्न अभिलेखों का अध्ययन व्यक्तिगत सम्पर्क के माध्यम से एवं नगर निगम की पत्रिका से विश्वासयुक्त आकड़े प्राप्त किए गए है। शोध प्रबंध की रचना करते समय निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखा गया है -
क्या नगर निगम द्वारा अपनी स्थापना के मूल उद्देश्यांे का क्रियान्वयन किया गया है?
क्या नगर निगम की स्थापना के उपरांत नगर में विद्युत आपूर्ति, शान्ति सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास हुआ है?
क्या नगर निगम की स्थापना से लोगों के सामान्य जीवन स्तर एवं आय में सुधार हुआ है?
क्या नगर निगम द्वारा सफाई व्यवस्था एवं आपदा प्रबंध के लिए कोई सुनियोजित कार्यक्रम निर्धारित है?
नगर निगम के आय के प्रमुख स्त्रोत एवं व्यय संरचना क्या है?
क्या नगर निगम के आय व्यय के बीच समन्वय स्थापित है?
क्या नगर निगम में बच्चों महिलाओं के लिये जीवकोपार्जन के लिये अनुदान राशि अर्थात् पेंशन की व्यवस्था की है ?
क्या नगर निगम रीवा ने मनोरंजन, पार्किंग एवं यातायात, अस्पताल, खेल का मैदान, बाल शिक्षा की व्यवस्था की है ?
शोध परिकल्पनाएँ:
शीर्षक से सम्बन्धित शोधार्थी की प्रमुख परिकल्पनायें निम्नलिखित है:-
नगर निगम की स्थापना के उपरांत नगर में विद्युत आपूर्ति, शान्ति सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का विकास हुआ है।
नगर निगम द्वारा सफाई व्यवस्था एवं आपदा प्रबंध के लिए कोई सुनियोजित कार्यक्रम निर्धारित है।
नगर निगम में बच्चों महिलाओं के लिये जीवकोपार्जन के लिये अनुदान राशि अर्थात् पेंशन की व्यवस्था की जा रही है।
नगर निगम रीवा ने मनोरंजन, पार्किंग एवं यातायात, अस्पताल, खेल का मैदान, बाल शिक्षा की व्यवस्था की है।
नगर निगम के आधुनिक तकनीक एवं उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के राशन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, के लिये बेबसाइट, ई-मेल, प्रोजेक्टर, एल0सी0जी0 आदि का प्रयोग किया जाता है।
शोध का क्षेत्र:
प्रस्तुत शोध प्रबंध रीवा नगर निगम से सम्बन्धित है। इस शोध प्रबंध में रीवा नगर निगम’ में आय-व्यय 2015-2016 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। और ये आंकड़े नगर निगम कार्यालय, नगर निगम की पत्रिका, वार्षिक प्रतिवेदन एवं दैनिक अखबारों से प्राप्त किये गये हैं। इस क्षेत्र का चुनाव शोध की महत्ता एवं समय सीमा को ध्यान में रखकर किया गया है।
शोध प्रविधि:
मानव एक जिज्ञासु प्राणी है वह अज्ञात तत्वों का पता लगाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ता जा रहा है। सामाजिक घटनायें भी अपने आप में काफी जटिल है एक ही घटना के पीछे अनेक कारण हो सकते है उन सभी कारणों को खोज निकालना कोई सरल कार्य नहीं है। जब सामाजिक क्षेत्र की समस्याओं के हल खोजने का व्यवस्थित प्रयास किया जाता है उसे ही सामाजिक अनुसंधान, शोध अन्वेषण या खोज का नाम दिया जाता है।
शोध कार्य में नगर निगम रीवा के आर्थिक क्रियाओं एवं विकास से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आकड़ो को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्त्रोतो एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े नगर पापलिक निगम रीवा से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।
तथ्यों का सारणीयन विश्लेषण एवं व्याख्या:
शोधार्थी द्वारा किया गया कोई भी शोघ कार्य सही अर्थो में तभी प्रभावी होते है, जब शोधार्थी द्वारा उस समस्या की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया जाये। इसके लिये यह आवश्यक है कि शेाधार्थी द्वारा शेाध अध्ययन मेें उपयोग किये गये समस्त शेाध उपकरण द्वारा प्राप्त जानकारियों को व्यवस्थित क्रम में सारणीबद्ध किया जाये।
शोध क्षेत्र में नगर निगम रीवा के आर्थिक क्रियाओं एवं विकास हेतु शेाधार्थी ने कुछ शोध उपकरणों की सहायता ली है, जिसके द्वारा एकत्रित तथ्यो का सारणीयन, विश्लेषण एवं व्याख्या द्वारा वस्तु स्थिति की जानकारी प्रस्तुत की गयी है। जो इस प्रकार है-
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि निगम को संपत्ति कर से प्राप्त आय वर्ष 2011-12 में 1196454.00 रू0 थी। संपत्ति कर से आय निगम की कुल आय का वर्ष 2012-13 में 0.34 प्रतिशत वर्ष 2013-14 में 2.34 प्रतिशत थी तथा वर्ष 2014-15 में यह कुल आय का 0.47 प्रतिशत है। इस आय को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। वर्ष 2016-17 में सम्पत्ति कर से प्राप्त आय बढ़कर 3823580.00 रू0 हो गयी है। संपत्ति कर की वसूली को निगम द्वारा नियमित एवं भ्रष्टाचार मुक्त करना चाहिए।
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है। कि निगम को यात्री कर से प्राप्त आय में बड़ी तेजी से वृद्धि हो रही है। जहाँ वर्ष 2011-12 में यह आय 978000.00 रू0 थी वहीं वर्ष 2012-13 में यह बढ़कर लगभग दो गुनी 1815000.00 रू0 हो गयी है। इस आय में वर्ष 2009-10 में 19.74 प्रतिशत वर्ष 2012-13 में 23.77 प्रतिशत तथा वर्ष 2013-14 में 38.37 प्रतिशत वृद्धि हुयी। यात्री कर आय का निगम की कुल आय में महत्वपूर्ण स्थान है। यह आय नगर निगम की कुल आय का वर्ष 2010-11 में 30.95 प्रतिशत 2012-13 में 22.97 प्रतिशत तथा वर्ष 2013-14 में 25.37 प्रतिशत है। वर्ष 2015-16 एवं 2016-17 में क्षतिपूर्ति से प्राप्त राशि में क्रमशः वृद्धि हुई है।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है। कि नगर निगम को जलकर से प्राप्त आय में लगातार वृद्धि हो रही है वर्ष 2011-12 में यह आय जहाँ 1015162.00 रू0 थीं वहीं वर्ष 2012-13 में बढ़कर लगभग दो गुनी 1919113.00 रू0 हो गयी है। इस आय में वर्ष 2011-12 में 13.67 प्रतिशत, 2012-13 में 9.83 प्रतिशत, तथा वर्ष 2013-14 में 38.09 प्रतिशत की वृद्धि हुयी। यह आय, निगम की आय का प्रमुख अंग है। वर्ष 2011-12 में यह आय नगर निगम की कुल आय का 2.67 प्रतिशत और 2011-12 में 3.75 प्रतिशत वर्ष 2013-14 में यह कुल आय का 7.32 प्रतिशत है। वर्ष 2016-17 में जलकर से प्राप्त कुल आय बढ़कर रू. 3010500.00 हो गयी है।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट होता है कि निगम को राज्य शासन से प्राप्त चुंगी क्षतिपूर्ति की राशि में निरंतर वृद्धि हो रही हैं। वर्ष 2011-12 में यह राशि 23220300.00 रू0 थी वहीं वर्ष 2012-13 में बढ़कर 31064300.00 तक पहुच गयी। वर्ष 2013-14 में यह राशि बढ़़कर 33138900.00 वर्ष 2014-15 में 39000000.00 है यह आय वर्ष 2016-17 में बढ़कर 39101600.00 हो गयी है।
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है। कि इस आय में उतार चढ़ाव होता रहा है। वर्ष 2011-12 में जहां यह आय 3800719.00 रू0 थी। वहीं वर्ष 2012-13 में 3453779.00 रू0 रह गयी । वर्ष 2013-14 में यह आय बढ़कर 5000000.00 रू0 तथा वर्ष 2014-15 में 5800000.00 रू0 रही है। वर्ष 2016-17 मे यह राशि बढकर 6119800.00 रूपये हो गई है। नगर निगम को इस आय में वृद्धि एवं इसकी वसूली को नियमित करनें के प्रयास किए जानें चाहिए।
उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि भूमि किराए की राशि में घट-बढ़ हुयी है। वर्ष 2011-12 में यह आय 41360.00 रू0 थी। जो वर्ष 2012-13 में घटकर 25739.00 रू0 हो गयी। यह आय वर्ष 2013-14 में बढ़कर 480031.00, रू0 वर्ष 2014-15 में 500000.00 रू0 रही है। वर्ष 2016-17 मे भूमि किराया से प्राप्त राशि बढकर 577250.00 रूपये हो गयी हैं।
उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है। कि निगम को बस स्टैण्ड फीस से प्राप्त हानेे वाली आय में लगातार वृद्धि हो रही है। जहाॅ वर्ष 2011-12 में यह आय 452157.00 रू0 थी वही 2012-13 में 482400.00 रू0 तक पहुॅच गयी। यह आय वर्ष 2013-14 में 700000.00 रही है। तथा 2014-15 में 8,25000 रूपये है तथा वर्ष 2016-17 मे आय की राशि बढते हुए 910900.00 रूपये तक पहुॅच गयी है।
निष्कर्ष:
नगर पालिक निगम निगम का गठन 9 जरवरी 2005 को हुआ, तब से लेकर आज तक निगम के समस्त श्रोतों एवं अनुदान से 2998.94 लाख रूपये प्राप्त हुए। जिसमें से 2978.16 लाख, रूपये व्यय किये गये। वेतन पर 1106,72 लाख जी.पी.एफ. पर 69.97 लाख, पाॅंचवे वेतनमान पर 36.24 लाख, जल प्रदाय पर 39.58 लाख, सड़क अनुरक्षण एवं मरम्मत पर 764.21 लाख रूपये व्यय किये गये। पिछले वित्तीय वर्ष में सड़क नाली एवं पुलिया का कार्य नगर पालिक निगम रीवा द्वारा रूपये 35703326.00 का कार्य कराया गया। प्रकाश व्यवस्था, जल आपूर्ति एवं हैण्डपम्प खनन तथा सफाई व्यवस्था में रूपये 260 लाख का कार्य कराया गया। जनभागीदारी योजना के अन्तर्गत अस्पताल चैराहे का विकास कार्य कराया गया। जिसमें 1320.84 लाख रूपये का कार्य कराया जाकर सुन्दर, सुव्यवस्थित चैराहा बनाया जाकर नगर बासियों को उपलब्ध कराया गया। इसी चैराहे पर पण्डित दीनदयाल जी की प्रतिमा स्थापित की गई हैं।
नगर पालिक निगम की कार्य व्यवस्था को संचालन एवं क्रियान्वयन नगर पालिक अधिनियम 1956 द्वारा होता है। उक्त प्रावधानों व स्थानीय स्वशासन में एक व्यक्ति या पद सम्प्रभुता या सर्वाधिकार प्राप्त नहीं है, बल्कि व्यवाहारिक व उत्तरदायित्व पूर्ण प्रशासन तथा जनमानस को महत्व देते हुए बहुमत के आधार पर निर्णय कर अधिकारों के उपयोग का निर्णय व विद्धान्त अपनाया गया है। नगर पालिक अधिनियम के अनुसार नगर निगम में महापौर या स्पीकर या प्रभारी सदस्य के पास एक सीमा या नियम जैसा उचित निर्णय कर अधिकार प्रदत्त कर सकते हैं।
लोकतंत्र में शासन जनता का होता है और उसे जनता के लिये जनता द्वारा संचालित किया जाता है। भारतीय संविधान सहभागी लोकतंत्र के सिद्धांत पर आधारित है। शासन व्यवस्था में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने के लिये नागरिकों द्वारा चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है। संविधान की यह मानता है कि जनता के चुने हेतु प्रतिनिधि की इच्छा व अकांक्षा के अनुरूप संविधान समस्त शासन का संचालन व नीतियों का निर्माण इस प्रकार हो कि प्रत्येक व्यक्ति को इसका अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये शासन के हर स्तर पर जनता के प्रति जबावदेही होना आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब नागरिको को शासन व उसके अधीन समस्त प्रशासनिक इकाईयों के क्रियाकलापों की उन सारी सूचनाओं को प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त हो जो उससे जुड़ी है या उससे जो जनहीत में आवश्यक है। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र शासन द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 लागू किया गया है।
नगर पालिक निगम रीवा में भी शासन की मंशानुसार, सूचना का अधिकार लागू किया गया है, जिसमें अपीली अधिकारी, लोक सूचना अधिकारी के साथ ही सहायका लोक सूचना अधिकारियों की नियुक्ति की गयी है। जिसमें जनता द्वारा चाई गयी जानकारी निर्धारित शुल्क जमा करने पर समय-समय पर उपलब्ध करायी जाती है। नगर निगम निगम रीवा द्वारा 1 अप्रैल 2010 से 31 दिसम्बर 2010 तक सूचना के अधिकार के अन्तर्गत 180 आवेदन पत्र प्राप्त हुये है। जिनमें निराकृत आवेदनों की संख्या 146 है। शेष 34 प्रकरणांे पर निराकरण किये जाने के कार्यवाही चल रही है।
सुझाव:
नगर निगम निगम की वित्तीय स्थिति को सुधारने हेतु निम्न सुझाव हैं:-
ऽ नगर निगम को अपनी वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए गैर कर साधनों की आय में वृद्धि करनी चाहिए और साथ ही साथ दुकानों, होटलों, जलपान गृह तथा भवन निर्माण कर आदि में वृद्धि करनी चाहिए।
ऽ नगर निगम कर्मचारियों द्वारा वार्षिक भाड़ा मूल्य सम्पत्ति कर के संबंध में प्रायः कम आंक लिया जाता है जिससे नगर निगम को काफी हानि होती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि नगर निगम के उच्च अधिकारियों द्वारा समय-समय पर स्वयं के द्वारा निरीक्षण किया जाए तथा वास्तविक वार्षिक भाड़ा मूल्य का निर्धारण कर सम्पत्ति कर की वसूली किया जाना चाहिए।
ऽ नगर की जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है जिससे नगर निगम को उस अनुपात में सुविधा जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस स्थिति से निपटने के लिए आगामी दस वर्षो की जनसंख्या का अनुमान लगाकर आय के स्त्रोतो में वृद्धि करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
ऽ नगर निगम द्वारा अपने आय-व्यय का निर्धारण करते समय अनुत्पादक व्ययों को सीमित करना चाहिए क्योंकि नगर निगम द्वारा अनुत्पादक कार्यो हेतु बड़ी मात्रा में राशि व्यय की जाती हैं।
ऽ नगर निगम के द्वारा बाजारों की स्थापना कर उनका विकास करना चाहिए तथा समय-समय पर बाजारों में सुधार भी करना चाहिए। बाजारों की स्थापना पर किया गया व्यय नगर निगम की आय में वृद्धि करने में सहयोग प्रदान करेगा।
ऽ नगर निगम द्वारा विभिन्न व्यवसायिक योजनायें जैसे शापिंग काम्पलेक्स का निर्माण कर उनका विक्रय प्रीमियम पद्धति पर दुकानों की नीलामी किया जाना चाहिए एवं आवर्ती आय की व्यवस्था की जानी चाहिए।
संदर्भ ग्रंथ सूची
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Received on 11.06.2019 Modified on 27.06.2019
Accepted on 10.07.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(3):655-660.